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mahabharat 13.18.116: 713 हिरण्यबाहु:—सुनहरी आभा वाले सुन्दर भुजाओं से सुशोभित, 714 गुहपाल: प्रवेशिनम्—गुफा में प्रवेश करने वाले योगियों की गुफा के रक्षक, 715 प्रकृष्टरी:—काम, क्रोध आदि शत्रुओं को निर्बल करने वाले, 716 महाहर्ष:—आनंदस्वरूप, 717 जितकाम:—काम को जीतने वाले, 718 जितेन्द्रिय:—इन्द्रियों पर विजय पाने वाले ॥116॥   |   mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल  »  श्लोक 116
 
 
श्लोक  13.18.116 
हिरण्यबाहुश्च तथा गुहापाल: प्रवेशिनाम्।
प्रकृष्टारिर्महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रिय:॥ ११६॥
 
 
अनुवाद
713 हिरण्यबाहु:—सुनहरी आभा वाले सुन्दर भुजाओं से सुशोभित, 714 गुहपाल: प्रवेशिनम्—गुफा में प्रवेश करने वाले योगियों की गुफा के रक्षक, 715 प्रकृष्टरी:—काम, क्रोध आदि शत्रुओं को निर्बल करने वाले, 716 महाहर्ष:—आनंदस्वरूप, 717 जितकाम:—काम को जीतने वाले, 718 जितेन्द्रिय:—इन्द्रियों पर विजय पाने वाले ॥116॥
 
713 Hiranyabahu:—adorned with beautiful arms having golden glow, 714 Guhapala: Praveshinam—protector of the cave of the yogis who enter the cave, 715 Prakrishtari:—one who weakens the enemies like lust, anger etc., 716 Mahaharsha:—form of bliss, 717 Jitkaam:—victorious of lust, 718 Jitendriya:- victorious over the senses. 116॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)