Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.18.112: 682 प्रभासात्मा - उत्कृष्ट अस्तित्व रूप, 683 जगत कालस्थल - प्रलयकाल में जगत का नाश करने वाला काल स्थान, 684 लोकहित - लोगों का हितैषी, 685 तरु - बचाने वाला, 686 सारंग - चातक रूप, 687 नवचक्रांग - नया हंस रूप, 688 केतुमाली - ध्वजाओं की मालाओं से सुशोभित, 689 सभावान - पूजा स्थल की रक्षा करने वाले। | mahabharat अध्याय 13.18: शिवसहस्रनामस्तोत्र और उसके पाठका फल । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
682 प्रभासात्मा - उत्कृष्ट अस्तित्व रूप, 683 जगत कालस्थल - प्रलयकाल में जगत का नाश करने वाला काल स्थान, 684 लोकहित - लोगों का हितैषी, 685 तरु - बचाने वाला, 686 सारंग - चातक रूप, 687 नवचक्रांग - नया हंस रूप, 688 केतुमाली - ध्वजाओं की मालाओं से सुशोभित, 689 सभावान - पूजा स्थल की रक्षा करने वाले।
682 Prabhasatma—excellent form of existence, 683 Jagat Kaalsthal:—place of time which destroys the world in the time of destruction, 684 Lokhit:—well-wisher of the people, 685 Taru:—one who saves, 686 Sarang:—Chatak form, 687 Navchakrang:—new swan form, 688 Ketumali—decorated with garlands of flags, 689 Sabhavan: Those who protect the place of worship.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥