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mahabharat 13.173.15: कार्तवीर्य अर्जुन ने कहा, "जब मैं प्रसन्न होता हूँ, तब प्राणियों की रचना कर सकता हूँ और जब मैं क्रोधित होता हूँ, तब उनका संहार कर सकता हूँ। मन, वाणी और कर्म से कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है।" ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.173: कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 173: कार्तवीर्य अर्जुनको दत्तात्रेयजी से चार वरदान प्राप्त होनेका एवं उनमें अभिमानकी उत्पत्तिका वर्णन तथा ब्राह्मणोंकी महिमाके विषयमें कार्तवीर्य अर्जुन और वायुदेवताके संवादका उल्लेख  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.173.15 
अर्जुन उवाच
कुर्यां भूतानि तुष्टोऽहं क्रुद्धो नाशं तथानये।
कर्मणा मनसा वाचा न मत्तोऽस्ति वरो द्विज:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
कार्तवीर्य अर्जुन ने कहा, "जब मैं प्रसन्न होता हूँ, तब प्राणियों की रचना कर सकता हूँ और जब मैं क्रोधित होता हूँ, तब उनका संहार कर सकता हूँ। मन, वाणी और कर्म से कोई भी ब्राह्मण मुझसे श्रेष्ठ नहीं है।" ॥15॥
 
Kartavirya Arjuna said, "When I am pleased, I can create beings and when I am angry, I can destroy them. No Brahmin is superior to me in mind, speech and action." ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)