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mahabharat 13.170.8: मैं समस्त धर्मों में इसी को सबसे बड़ा धर्म मानता हूँ कि मनुष्य सदैव भक्तिपूर्वक कमलनेत्र भगवान वासुदेव की स्तुति गाकर उनकी पूजा करे ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 13.170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  13.170.8 
एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मत:।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नर: सदा॥ ८॥
 
 
अनुवाद
मैं समस्त धर्मों में इसी को सबसे बड़ा धर्म मानता हूँ कि मनुष्य सदैव भक्तिपूर्वक कमलनेत्र भगवान वासुदेव की स्तुति गाकर उनकी पूजा करे ॥8॥
 
Of all the religions, I consider this to be the greatest religion that a man should always worship the lotus-eyed Lord Vasudeva with devotion by singing His praises. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)