Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.170.57: 405 वैकुण्ठः -परमधाम रूप, 406 पुरुषः -जो संसार रूप में शयन करता है, 407 प्राणः -जो प्राणवायु के रूप में विचरण करता है, 408 प्राणदः -जो स्वर्ग के आदि में जीवन प्रदान करता है, 409 प्रणवः -ओमकार-रूप, 410 पृथुः -जो विराट्रूप में विस्तार करता है, 411 हिरण्यगर्भः -जो ब्रह्मा के रूप में प्रकट होता है, 412 शत्रुघ्नः -देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाला, 413 व्याप्तः - कारणवश सम्पूर्ण कर्मों में व्याप्त, 414 वायुः -जो पवन के रूप में है, 415 अधोक्षजः - जो अपने रूप से क्षीण नहीं होता । 57॥ | mahabharat अध्याय 13.170: श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम् । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
405 वैकुण्ठः -परमधाम रूप, 406 पुरुषः -जो संसार रूप में शयन करता है, 407 प्राणः -जो प्राणवायु के रूप में विचरण करता है, 408 प्राणदः -जो स्वर्ग के आदि में जीवन प्रदान करता है, 409 प्रणवः -ओमकार-रूप, 410 पृथुः -जो विराट्रूप में विस्तार करता है, 411 हिरण्यगर्भः -जो ब्रह्मा के रूप में प्रकट होता है, 412 शत्रुघ्नः -देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाला, 413 व्याप्तः - कारणवश सम्पूर्ण कर्मों में व्याप्त, 414 वायुः -जो पवन के रूप में है, 415 अधोक्षजः - जो अपने रूप से क्षीण नहीं होता । 57॥
405 Vaikuntha: -Paramadham form, 406 Purusha: -One who sleeps in the world form, 407 Prana: -One who moves in the form of Pranavayu, 408 Pranad: -One who provides life in the beginning of heaven, 409 Pranav: -Omkar-form, 410 Prithu: -One who expands in the form of Viratru, 411 Hiranyagarbha: -One who appears in the form of Brahma, 412 Shatrughan: -killer of the enemies of the Gods, 413 Vyapat: - Pervaded in all actions due to reason, 414 Vayu: - In the form of wind, 415 Adhokshaj: - Not diminished by its form. 57॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥