श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.17.9 
मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम्।
अग्राह्यमचलं शुद्धं बुद्धिग्राह्यं मनोमयम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वे मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण जगत् और ब्रह्माजी की गति हैं। वे मन और इन्द्रियों द्वारा ग्रहण नहीं किए जा सकते। वे अगोचर, अचल, शुद्ध, बुद्धि द्वारा अनुभव करने योग्य और सुखदायक हैं। 9॥
 
He is the movement of Manu, Indra, Agni, Marudgana, the entire world and also Brahmaji. They cannot be received by the mind and senses. They are imperceptible, immovable, pure, capable of being experienced by the intellect and are pleasant. 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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