श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  13.17.57-58 
इयं सा परमा काष्ठा इयं सा परमा कला।
इयं सा परमा सिद्धिरियं सा परमा गति:॥ ५७॥
इयं सा परमा शान्तिरियं सा निर्वृति: परा।
यं प्राप्य कृतकृत्या: स्म इत्यमन्यन्त योगिन:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
यही वह शिखर है, यही वह परम कला है, यही वह परम सिद्धि है और यही वह परम गति है और यही वह परम शांति और परम सुख भी है, जिसे प्राप्त करके योगीजन अपने को सिद्ध मानते हैं।
 
This is that pinnacle, this is that ultimate art, this is that ultimate accomplishment and this is that ultimate speed and this is also that ultimate peace and that ultimate happiness, after attaining which the Yogis consider themselves accomplished.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd