श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 52-54h
 
 
श्लोक  13.17.52-54h 
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ ग्रहाश्च सह वायुना।
ध्रुव: सप्तर्षयश्चैव भुवना: सप्त एव च॥ ५२॥
प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम्।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत् ॥ ५३॥
अष्टौ प्रकृतयश्चैव प्रकृतिभ्यश्च य: पर:।
 
 
अनुवाद
चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, वायु, ध्रुव, सप्तर्षि, सात लोक, मूल प्रकृति, सार, विकारों सहित सम्पूर्ण तत्त्व, ब्रह्मा से लेकर कीड़ों पर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, अस्तेय, असार और असत् ये आठ प्रकृतियाँ तथा प्रकृति से परे पुरुष, ये सभी महादेवजी के स्वरूप में स्थित हैं। 52-53 1/2॥
 
The Moon, the Sun, the constellations, the planets, the air, the poles, the Saptarishis, the seven planets, the original nature, the essence, all the elements including the vices, the entire world from Brahma to the insects, the eight natures of existence, existence and non-existence and the man who is beyond nature, all these are present in the form of Mahadevji. 52-53 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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