श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  13.17.25 
यच्चैतत् परमं ब्रह्म यच्च तत् परमं पदम्।
या गति: सांख्ययोगानां स भवान् नात्र संशय:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो यह परब्रह्म है, जो परम धाम है, सांख्य के जानने वालों और योगियों का गन्तव्य है, वह आप ही हैं - इसमें संशय नहीं है ॥25॥
 
The one who is this Supreme Brahman, the one who is the ultimate abode, the destination of the knowers of Sankhya and the Yogis, is You only - there is no doubt in this. ॥25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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