श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  13.17.24 
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च प्रकृतिभ्य: परं ध्रुवम्।
विश्वाविश्वपरोभावश्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि॥ २४॥
 
 
अनुवाद
आप ही इन्द्रियाँ और उनके विषय हैं। आप ही प्रकृति से परे अचल और अविनाशी तत्त्व हैं। आप ही ब्रह्माण्ड और असम्भव दोनों से परे अद्वितीय सत्ता हैं, तथा आप ही चिन्तनीय और अचिन्तनीय हैं ॥24॥
 
You are the senses and their objects. You are the motionless and indestructible element beyond nature. You are the unique being beyond both the universe and the non-universe, and you are the thinkable and the unthinkable. ॥24॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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