श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 17: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद—महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  13.17.11-12h 
य: प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मन:।
तं देवं दर्शनाकाङ्क्षी बहून् वर्षगणानृषि:॥ ११॥
तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्ट्वा तुष्टाव चेश्वरम्॥
 
 
अनुवाद
तण्डि मुनि उन देवताओं के दर्शन की इच्छा से बहुत वर्षों तक कठोर तप में लगे रहे, जो जीवरूप धारण करके मन की ज्योति के रूप में वहाँ निवास करते थे। उनके दर्शन होने पर उन मुनि ने जगदीश्वर शिव की इस प्रकार स्तुति की ॥11 1/2॥
 
Tandi Muni remained engaged in rigorous penance for many years with the desire to see the gods who had transformed themselves into living beings and resided there as a light of mind. When he got his darshan, that sage praised Jagdishwar Shiva in this way. 11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)