श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 168: वंशपरम्पराका कथन और भगवान‍् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  13.168.55 
त्रिशिरास्तस्य दिव्यश्च शातकुम्भमयो द्रुम:।
ध्वजस्तृणेन्द्रो देवस्य भविष्यति रथाश्रित:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
तीन शिखाओं वाला दिव्य स्वर्णमय तालवृक्ष बलदेवजी के रथ पर ध्वजा के रूप में सुशोभित होगा ॥55॥
 
The divine golden tala tree with three crests will be decorated in the form of a flag on Baldevji's chariot. 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)