श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 168: वंशपरम्पराका कथन और भगवान‍् श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन  »  श्लोक 50
 
 
श्लोक  13.168.50 
कर्मणा मनसा वाचा स नमस्यो द्विजै: सदा।
यत्नवद्भिरुपस्थाय द्रष्टव्यो देवकीसुत:॥ ५०॥
 
 
अनुवाद
द्विज मनुष्यों को मन, वाणी और कर्म से सदैव उस भगवान् को प्रणाम करना चाहिए और यत्नपूर्वक पूजन करके उस देवी का दर्शन करना चाहिए ॥50॥
 
Dwij people should always pay obeisance to that God with their mind, speech and actions and by worshiping diligently, they should have the darshan of that goddess. 50॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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