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mahabharat 13.167.57-58: यदि पति दरिद्र हो जाए, किसी रोग से पीड़ित हो जाए, किसी विपत्ति में फंस जाए, शत्रुओं के बीच में फंस जाए अथवा ब्राह्मण के शाप से पीड़ित हो और ऐसी स्थिति में वह कोई अवांछनीय कार्य, अधार्मिक कार्य अथवा मृत्यु का भी आदेश दे, तो उसे आपत्तिकाल का कर्तव्य समझकर बिना किसी संदेह के तुरन्त कर देना चाहिए ॥57-58॥   |   mahabharat अध्याय 13.167: पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 167: पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  13.167.57-58 
यद्यकार्यमधर्मं वा यदि वा प्राणनाशनम्।
पतिर्ब्रूयाद् दरिद्रो वा व्याधितो वा कथंचन॥ ५७॥
आपन्नो रिपुसंस्थो वा ब्रह्मशापार्दितोऽपि वा।
आपद्धर्माननुप्रेक्ष्य तत्कार्यमविशङ्कया॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
यदि पति दरिद्र हो जाए, किसी रोग से पीड़ित हो जाए, किसी विपत्ति में फंस जाए, शत्रुओं के बीच में फंस जाए अथवा ब्राह्मण के शाप से पीड़ित हो और ऐसी स्थिति में वह कोई अवांछनीय कार्य, अधार्मिक कार्य अथवा मृत्यु का भी आदेश दे, तो उसे आपत्तिकाल का कर्तव्य समझकर बिना किसी संदेह के तुरन्त कर देना चाहिए ॥57-58॥
 
If the husband becomes poor, is afflicted with some disease, gets entangled in some calamity, gets caught in the midst of enemies or is suffering due to the curse of a Brahmin, and in such a situation he orders an undesirable act, an irreligious act or even death, then it should be considered as the duty of the time of emergency and should be carried out immediately without any doubt. ॥57-58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)