| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 167: पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन » श्लोक 41-42 |
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| | | | श्लोक 13.167.41-42  | शुश्रूषां परिचारं च देवतुल्यं प्रकुर्वती।
वश्या भावेन सुमना: सुव्रता सुखदर्शना।
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तु: सा धर्मचारिणी॥ ४१॥
परुषाण्यपि चोक्ता या दृष्टा दृष्टेन चक्षुषा।
सुप्रसन्नमुखी भर्तुर्या नारी सा पतिव्रता॥ ४२॥ | | | | | | अनुवाद | | जो स्त्री हृदय में प्रेम रखकर पति के अधीन रहती है, मन को प्रसन्न रखती है, पति की देवता के समान सेवा करती है, उत्तम व्रतों का पालन करती है और पति को प्रसन्न करने वाले सुन्दर वस्त्र पहनती है, जिसका मन पति के अतिरिक्त किसी और की ओर नहीं जाता, जो स्त्री पति के सम्मुख प्रसन्नचित्त रहती है, वह धर्मपरायण स्त्री मानी जाती है। जो स्त्री पति के कठोर बोलने या तिरस्कार भरी दृष्टि से देखने पर भी प्रसन्नतापूर्वक मुस्कुराती रहती है, वह पतिव्रता स्त्री है। | | | | The woman who, out of love in her heart, remains subservient to her husband, keeps her mind happy, serves her husband like a god, observes good vows and wears beautiful clothes that are pleasing to her husband, whose mind does not go towards anyone else except her husband, the woman who remains cheerful in front of her husband is considered to be a woman of Dharma. The woman who keeps smiling happily even when her husband speaks harshly or looks at her with a faulty gaze is a woman who is faithful to her husband. | | ✨ ai-generated | | |
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