| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 167: पार्वतीजीके द्वारा स्त्री-धर्मका वर्णन » श्लोक 35-36 |
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| | | | श्लोक 13.167.35-36  | सुस्वभावा सुवचना सुवृत्ता सुखदर्शना।
अनन्यचित्ता सुमुखी भर्तु: सा धर्मचारिणी॥ ३५॥
सा भवेद् धर्मपरमा सा भवेद् धर्मभागिनी।
देववत् सततं साध्वी या भर्तारं प्रपश्यति॥ ३६॥ | | | | | | अनुवाद | | जिसका स्वभाव, वाणी और आचरण उत्तम हो, जिसके दर्शन से पति प्रसन्न हो, जो अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष में रुचि न रखती हो तथा जो अपने पति के सम्मुख सदैव प्रसन्नचित्त रहती हो, वह धर्म का पालन करने वाली स्त्री मानी गई है। जो पतिव्रता स्त्री अपने पति को सदैव भगवान् के समान समझती है, वह धर्म परायण है और वही धर्म का फल पाने वाली है॥ 35-36॥ | | | | A woman whose nature, speech and conduct are good, whose sight gives pleasure to her husband, who does not have interest in any other man except her husband and who is always cheerful in front of her husband, is considered to be a woman who follows Dharma. A virtuous woman who always considers her husband to be like God, is devoted to Dharma and she is the one who gets the fruits of Dharma.॥ 35-36॥ | | ✨ ai-generated | | |
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