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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 166: पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]  »  श्लोक d28-d31
 
 
श्लोक  13.166.d28-d31 
सघृतं गुग्गुलं सम्यग् धूपयेद् य: शिवान्तिके।
गोसवस्य तु यज्ञस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत्॥
यस्तु गुग्गुलपिण्डेन केवलेनापि धूपयेत्।
तस्य रुक्मप्रदानस्य यत् फलं तस्य तद् भवेत्॥
यस्तु नानाविधै: पुष्पैर्मम लिङ्गं समर्चयेत्।
स हि धेनुसहस्रस्य दत्तस्य फलमाप्नुयात्॥
यस्तु देशान्तरं गत्वा शिवलिङ्गं समर्चयेत्।
तस्मात् सर्वमनुष्येषु नास्ति मे प्रियकृत्तम:॥
 
 
अनुवाद
जो शिवलिंग के समीप घी में मिश्रित गुग्गुल की उत्तम धूप अर्पित करता है, उसे गोसेवा नामक यज्ञ का फल मिलता है। जो केवल गुग्गुल की गोलियों से धूप अर्पित करता है, उसे स्वर्ण दान का फल मिलता है। जो नाना प्रकार के पुष्पों से मेरे शिवलिंग का पूजन करता है, उसे एक हजार गायों के दान का फल मिलता है। जो अन्य देशों में जाकर शिवलिंग की पूजा करता है, उससे बढ़कर समस्त मनुष्यों में मुझसे प्रेम करने वाला कोई नहीं है।
 
He who offers the finest incense of guggul mixed with ghee near the Shiva lingam, gets the fruit of the sacrifice called Gosava. He who offers incense only with guggul balls, gets the fruit of donating gold. He who worships my lingam with various kinds of flowers, gets the fruit of donating a thousand cows. He who goes to other countries and worships the Shiva lingam, there is no one who loves me more than him among all the human beings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)