Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.166.d22-d23: तीनों लोकों में मैंने अपने ही स्वरूप शिवलिंग स्थापित किए हैं। उन्हें नमस्कार करने मात्र से ही मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। हवन, दान, स्वाध्याय और बहुत-सी दक्षिणा से किया गया दान भी शिवलिंग को नमस्कार करने से प्राप्त होने वाले पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हो सकता। | mahabharat अध्याय 13.166: पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य] । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स्थापितं त्रिषु लोकेषु शिवलिङ्गं मया मम।
नमस्कारेण वा तस्य मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै:॥
इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्च बहुदक्षिणा:।
शिवलिङ्गप्रणामस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
अनुवाद
तीनों लोकों में मैंने अपने ही स्वरूप शिवलिंग स्थापित किए हैं। उन्हें नमस्कार करने मात्र से ही मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। हवन, दान, स्वाध्याय और बहुत-सी दक्षिणा से किया गया दान भी शिवलिंग को नमस्कार करने से प्राप्त होने वाले पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं हो सकता।
In all the three worlds I have established Shivalingas which are my own manifestation. By merely saluting them, a person is freed from all sins. Even the sacrifices made by offering fire, charity, study and a lot of dakshina cannot equal even one-sixteenth of the virtue gained by saluting the Shivalinga.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥