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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 166: पाशुपत योगका वर्णन तथा शिवलिंग-पूजनका माहात्म्य]  »  श्लोक d13-d15
 
 
श्लोक  13.166.d13-d15 
गृहीतं तच्च तै: सर्वं मुखाच्च मम दक्षिणात्।
श्रुत्वा तत् त्रिषु लोकेषु स्थापितं चापि तै: पुन:॥
इदानीं च त्वया पृष्टो वदाम्येकमना: शृणु॥
अहं पशुपतिर्नाम मद्भक्ता ये च मानवा:।
सर्वे पाशुपता ज्ञेया भस्मदिग्धतनूरुहा:॥
 
 
अनुवाद
मेरे दाहिने हाथ से सारी शिक्षा सुनकर उन्होंने उसे ग्रहण किया और पुनः तीनों लोकों में स्थापित कर दिया। अब जब तुमने मुझसे पूछा है, तो मैं उसी पाशुपत योग का वर्णन कर रहा हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। मेरा नाम पशुपति है। जो मेरे भक्त हैं और जिनके रोम-रोम पर भस्म रमी हुई है, उन्हें पाशुपत जानना चाहिए।
 
After listening to all the teachings from my right-hand side, he accepted them and again established them in the three worlds. Now that you have asked me, I am describing the same Pashupat Yog, listen with full attention. My name is Pashupati. Those who are my devotees and who have ashes smeared on their every pore should be known as Pashupat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)