Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.164.d7-d8: सत्व, रज और तम - ये तीन स्वाभाविक गुण हैं। प्रकृति इन्हीं तीन अंतर्निहित गुणों से सम्पूर्ण जगत् की रचना करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, देह, चेतना और आसक्ति - इन्हें बुद्धिमान पुरुषों को प्रकृति के विकार जानना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.164: सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 164: सांख्यज्ञानका प्रतिपादन करते हुए अव्यक्तादि चौबीस तत्त्वोंकी उत्पत्ति आदिका वर्णन]  »  श्लोक d7-d8
 
 
श्लोक  13.164.d7-d8 
सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।
तै: सृजत्यखिलं लोकं प्रकृतिस्त्वात्मजैर्गुणै:॥
इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं सङ्घातश्चेतना धृति:।
विकारा: प्रकृतेश्चैते वेदितव्या मनीषिभि:॥
 
 
अनुवाद
सत्व, रज और तम - ये तीन स्वाभाविक गुण हैं। प्रकृति इन्हीं तीन अंतर्निहित गुणों से सम्पूर्ण जगत् की रचना करती है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, देह, चेतना और आसक्ति - इन्हें बुद्धिमान पुरुषों को प्रकृति के विकार जानना चाहिए।
 
Sattva, Raja and Tama – these are the three natural qualities. Nature creates the entire world with these three intrinsic qualities. Desire, aversion, happiness, sorrow, physical body, consciousness and attachment – ​​these should be known to wise people as the disorders of nature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)