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श्लोक  13.163.d82 
इन्द्रियेषु च जीर्यत्सु च्छिद्यमाने तथाऽऽयुषि।
पुरस्ताच्च स्थिते मृत्यौ किं सुखं पश्यत: शुभे॥
 
 
अनुवाद
शुभ! इन्द्रियाँ निरन्तर क्षीण होती जा रही हैं, जीवन नष्ट होता जा रहा है और मृत्यु सामने खड़ी है - यह सब देखकर इस संसार में क्या सुख मिल सकता है?
 
Shubh! The senses are constantly deteriorating, life is getting wasted and death is standing in front - seeing all this, what happiness can one find in this world?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)