Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.163.d101-d104: नासमझ मनुष्य सोचता रहता है कि अगले वर्षा ऋतु में यह काम करूँगा, ग्रीष्म और वसन्त में फलाना काम शुरू करूँगा; परन्तु वह मृत्यु की ओर ध्यान नहीं देता, जो इसमें बाधक बनकर खड़ी है। 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए', इस प्रकार मनुष्य मन में योजनाएँ बनाता रहता है। उसकी इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं और वह मृत्यु की ओर खिंचता चला जाता है। जो प्राणी काल के बंधन में बँधे हुए हैं, दिन-प्रतिदिन वृद्ध हो रहे हैं, कुमार्ग पर भटक रहे हैं, उनका इस जीवन पर विश्वास कैसे हो सकता है? मनुष्य को युवावस्था से ही सद्गुणी होना चाहिए; क्योंकि जीवन का कोई प्रबल कारण नहीं है। पके फलों की तरह, इसके गिरने का खतरा सदैव बना रहता है। | mahabharat अध्याय 13.163: मोक्षधर्मकी श्रेष्ठताका प्रतिपादन, मोक्षसाधक ज्ञानकी प्राप्तिका उपाय और मोक्षकी प्राप्तिमें वैराग्यकी प्रधानता] । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
वर्षास्विदं करिष्यामि इदं ग्रीष्मवसन्तयो:।
इति बालश्चिन्तयति अन्तरायं न बुध्यते॥
इदं मे स्यादिदं मे स्यादित्येवं मनसा नरा:।
अनवाप्तेषु कामेषुु ह्रियन्ते मरणं प्रति॥
कालपाशेन बद्धानामहन्यहनि जीर्यताम्।
का श्रद्धा प्राणिनां मार्गे विषमे भ्रमतां सदा॥
युवैव धर्मशील: स्यादनिमित्तं हि जीवितम्।
फलानामिव पक्वानां सदा हि पतनाद् भयम्॥
अनुवाद
नासमझ मनुष्य सोचता रहता है कि अगले वर्षा ऋतु में यह काम करूँगा, ग्रीष्म और वसन्त में फलाना काम शुरू करूँगा; परन्तु वह मृत्यु की ओर ध्यान नहीं देता, जो इसमें बाधक बनकर खड़ी है। 'मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए', इस प्रकार मनुष्य मन में योजनाएँ बनाता रहता है। उसकी इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं और वह मृत्यु की ओर खिंचता चला जाता है। जो प्राणी काल के बंधन में बँधे हुए हैं, दिन-प्रतिदिन वृद्ध हो रहे हैं, कुमार्ग पर भटक रहे हैं, उनका इस जीवन पर विश्वास कैसे हो सकता है? मनुष्य को युवावस्था से ही सद्गुणी होना चाहिए; क्योंकि जीवन का कोई प्रबल कारण नहीं है। पके फलों की तरह, इसके गिरने का खतरा सदैव बना रहता है।
An unwise man keeps thinking that he will do this work in the next rainy season and will start this or that work in summer and spring; but he does not pay attention to death which stands as an obstacle in it. 'I should have this, I should have that', in this way man makes plans in his mind. His desires remain unfulfilled and he keeps getting drawn towards death. How can the beings who are bound in the bondage of time and are getting old day by day and are wandering on the wrong path have faith in this life. Man should be virtuous from his youth itself; because there is no strong reason for life. Like ripe fruits, it is always in danger of falling.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥