श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 162: प्राणियोंकी शुभ और अशुभ गतिका निश्चय करानेवाले लक्षणोंका वर्णन, मृत्युके दो भेद और यत्नसाध्य मृत्युके चार भेदोंका कथन, कर्तव्य-पालनपूर्वक शरीरत्यागका महान् फल और काम, क्रोध आदिद्वारा देहत्याग करनेसे नरककी प्राप्ति]  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  13.162.d2 
श्रीमहेश्वर उवाच
तदहं ते प्रवक्ष्यामि जीवितं विद्यते यथा।
द्विविधा: प्राणिनो लोके दैवासुरसमाश्रिता:॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- देवी! मैं तुम्हें बताता हूँ कि जीवों का जीवन कैसा होता है। संसार में दो प्रकार के जीव हैं- एक दैवी स्वभाव पर आश्रित और दूसरे आसुरी स्वभाव पर आश्रित।
 
Shri Maheshwar said- Devi! I will tell you what the life of living beings is like. There are two types of living beings in the world- one dependent on divine nature and the other dependent on demonic nature.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)