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mahabharat 13.161.d59: शरीर और काल के बीच के अंतर को आपद्धर्म के रूप में भी देखा जा सकता है। इस संसार में रहने वाले मनुष्य ही धर्म को विभिन्न प्रकार से भेद करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d59
 
 
श्लोक  13.161.d59 
शरीरकालवैषम्यादापद्धर्मश्च दृश्यते।
एतद् धर्मस्य नानात्वं क्रियते लोकवासिभि:॥
 
 
अनुवाद
शरीर और काल के बीच के अंतर को आपद्धर्म के रूप में भी देखा जा सकता है। इस संसार में रहने वाले मनुष्य ही धर्म को विभिन्न प्रकार से भेद करते हैं।
 
The difference between the body and time can also be seen as Apaddharma. It is the human beings living in this world who differentiate religion in different ways.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)