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mahabharat 13.161.d56: उन्होंने कहा, "हे प्रभु! हे जगत के स्वामी! धर्म कितने प्रकार के होते हैं? संत लोग सर्वत्र कितने प्रकार के धर्म देखते हैं? कृपया मुझे यह बताइए।"   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.161.d56 
उमोवाच
भगवँल्लोकपालेश धर्मस्तु कतिभेदक:।
दृश्यते परित: सद्भिस्तन्मे शंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने कहा, "हे प्रभु! हे जगत के स्वामी! धर्म कितने प्रकार के होते हैं? संत लोग सर्वत्र कितने प्रकार के धर्म देखते हैं? कृपया मुझे यह बताइए।"
 
He said, "O Lord! O lord of the world! How many kinds of religion are there? How many kinds of religion do the saints see everywhere? Please tell me this."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)