श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d48
 
 
श्लोक  13.161.d48 
श्रीमहेश्वर उवाच
मनसा तत्त्वत: शुद्धमानृशंस्यपुरस्सरम्।
प्रीत्या तु सर्वदानानि दत्त्वा फलमवाप्नुयात् ॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- प्रिये! जो दान शुद्ध हृदय से अर्थात् निःस्वार्थ भाव से दिया गया हो, जिसमें क्रूरता न हो, जो दयापूर्वक दिया गया हो, वह दान शुभ फल देने वाला है। सभी प्रकार के दानों को प्रसन्नतापूर्वक देने से दाता को शुभ फल प्राप्त होते हैं।
 
Shri Maheshwar said-Dear! The charity which is pure in essence because it is given with a pure heart i.e. selflessly, in which there is no cruelty, which is given with kindness, is going to give auspicious results. By giving all types of donations with joy, the giver gets auspicious results.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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