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mahabharat 13.161.d46: अथवा म्लेच्छ देश में जन्मा मनुष्य वहीं अपने पापों का फल भोगता है। अशुभ दान से पाप होता है और उसका फल भोगने के लिए दाता नरक में या मृत्यु के बाद पशु योनि में जाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.161.d46 
अथवा म्लेच्छदेशेषु तत्र तत्फलतां व्रजेत्।
नरकं प्रेत्य तिर्यक्षु गच्छेदशुभदानत:॥
 
 
अनुवाद
अथवा म्लेच्छ देश में जन्मा मनुष्य वहीं अपने पापों का फल भोगता है। अशुभ दान से पाप होता है और उसका फल भोगने के लिए दाता नरक में या मृत्यु के बाद पशु योनि में जाता है।
 
Or a man born in a mlechha country gets the fruits of his sins there. An inauspicious donation leads to sins and to suffer the consequences of that, the donor goes to hell or to animal species after death.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)