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mahabharat 13.161.d43: गुणों से रहित दान निकृष्ट कहा गया है। यदि दान उपर्युक्त छः गुणों के विपरीत किया जाए, तो वह पाप कहलाता है।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d43
 
 
श्लोक  13.161.d43 
गुणतस्तु तथा हीनं दानं हीनमिति स्मृतम्।
दानं पातकमित्याहु: षड्गुणानां विपर्यये॥
 
 
अनुवाद
गुणों से रहित दान निकृष्ट कहा गया है। यदि दान उपर्युक्त छः गुणों के विपरीत किया जाए, तो वह पाप कहलाता है।
 
Charity without qualities is said to be inferior. If charity is done contrary to the above mentioned six qualities, then it is said to be sinful.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)