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mahabharat 13.161.d35-d36: देवि! भामिनी! दान के लाभ का प्रमाण सुनो। संसार में मनुष्य के पास जो भी मूल्यवान वस्तु हो, उसका दान उसके लिए सर्वोत्तम माना जाता है। अच्छा लगता है! इसी को इस पृथ्वी पर सम्पूर्ण दान की विधि कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d35-d36
 
 
श्लोक  13.161.d35-d36 
प्रमाणकल्पनां देवि दानस्य शृणु भामिनि॥
यत्सारस्तु नरो लोके तद् दानं चोत्तमं स्मृतम्।
सर्वदानविधिं प्राहुस्तदेव भुवि शोभने॥
 
 
अनुवाद
देवि! भामिनी! दान के लाभ का प्रमाण सुनो। संसार में मनुष्य के पास जो भी मूल्यवान वस्तु हो, उसका दान उसके लिए सर्वोत्तम माना जाता है। अच्छा लगता है! इसी को इस पृथ्वी पर सम्पूर्ण दान की विधि कहते हैं।
 
Devi! Bhamini! Listen to the proof of the benefits of charity. Whatever valuable thing a man has in the world, charity of it is considered to be the best for him. Looks good! That is called the method of complete charity on this earth.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)