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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d32
 
 
श्लोक  13.161.d32 
श्राद्धद: स्वर्गमाप्नोति निर्मलं विविधात्मकम्।
अप्सरोगणसंघुष्टं विरजस्कमनन्तरम्॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति श्राद्ध करता है, वह विभिन्न आकार वाले स्वर्गलोकों में स्थायी निवास प्राप्त करता है, जो शुद्ध, रजोगुण से रहित तथा अप्सराओं द्वारा सेवित होते हैं।
 
A person who performs Shraddha obtains permanent residence in the heavenly planets of various shapes, which are pure, devoid of the quality of passion and served by the Apsaras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)