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mahabharat 13.161.d25: जहाँ यह श्राद्ध या पूजा की जा रही हो, वहाँ न तो कुछ बोलना चाहिए और न ही एक-दूसरे से बात करनी चाहिए। अपनी वाणी और शरीर को संयमित रखते हुए श्राद्ध कर्म आरंभ करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d25
 
 
श्लोक  13.161.d25 
यत्र तत् क्रियते तत्र न जल्पेन्न जपेन्मिथ:।
नियम्य वाचं देहं च श्राद्धकर्म समारभेत्॥
 
 
अनुवाद
जहाँ यह श्राद्ध या पूजा की जा रही हो, वहाँ न तो कुछ बोलना चाहिए और न ही एक-दूसरे से बात करनी चाहिए। अपनी वाणी और शरीर को संयमित रखते हुए श्राद्ध कर्म आरंभ करना चाहिए।
 
Where this Shraddha or worship is being performed, one should neither speak anything nor talk to each other. One should start the Shraddha ritual by keeping one's speech and body under control.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)