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mahabharat 13.161.d23-d24: इस प्रकार दिया गया पिंडदान पितरों के लिए अक्षय होता है। तत्पश्चात मन को वश में रखते हुए, पवित्र होकर यथाशक्ति ब्राह्मणों को दक्षिणा और भौतिक वस्तुएं देकर उनका पूजन करें। जिससे वे तृप्त हों।   |   mahabharat अध्याय 13.161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 161: श्राद्धविधान आदिका वर्णन, दानकी त्रिविधतासे उसके फलकी भी त्रिविधताका उल्लेख, दानके पाँच फल, नाना प्रकारके धर्म और उनके फलोंका प्रतिपादन]  »  श्लोक d23-d24
 
 
श्लोक  13.161.d23-d24 
एतेन विधिना दत्तं पितॄणामक्षयं भवेत्।
ततो विप्रान् यथाशक्ति पूजयेन्नियत: शुचि:॥
सदक्षिणं ससम्भारं यथा तुष्यन्ति ते द्विजा:॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार दिया गया पिंडदान पितरों के लिए अक्षय होता है। तत्पश्चात मन को वश में रखते हुए, पवित्र होकर यथाशक्ति ब्राह्मणों को दक्षिणा और भौतिक वस्तुएं देकर उनका पूजन करें। जिससे वे तृप्त हों।
 
The Pind Daan given in this manner is eternal for the ancestors. After that, keeping the mind under control, become pure and worship the Brahmins as much as possible by giving them dakshina and material things. So that they are satisfied.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)