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mahabharat 13.16.6: मैं ब्राह्मणों पर कभी क्रोध न करूँ। मेरे पिता मुझ पर प्रसन्न हों। मुझे सैकड़ों पुत्रों की प्राप्ति हो। मुझे सदैव उत्तम सुख प्राप्त हों। हमारे परिवार में सुख बना रहे। मेरी माता भी प्रसन्न रहें। मुझे शांति मिले और मैं प्रत्येक कार्य में निपुण होऊँ - ये आठ वर मैं माँगता हूँ।॥6॥   |   mahabharat अध्याय 13.16: शिव और पार्वतीका श्रीकृष्णको वरदान और उपमन्युके द्वारा महादेवजीकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.16.6 
द्विजेष्वकोपं पितृत: प्रसादं
शतं सुतानां परमं च भोगम्।
कुले प्रीतिं मातृतश्च प्रसादं
शमप्राप्तिं प्रवृणे चापि दाक्ष्यम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
मैं ब्राह्मणों पर कभी क्रोध न करूँ। मेरे पिता मुझ पर प्रसन्न हों। मुझे सैकड़ों पुत्रों की प्राप्ति हो। मुझे सदैव उत्तम सुख प्राप्त हों। हमारे परिवार में सुख बना रहे। मेरी माता भी प्रसन्न रहें। मुझे शांति मिले और मैं प्रत्येक कार्य में निपुण होऊँ - ये आठ वर मैं माँगता हूँ।॥6॥
 
‘May I never be angry with Brahmins. May my father be pleased with me. May I be blessed with hundreds of sons. May I always have the best of pleasures. May there be happiness in our family. May my mother also be happy. May I get peace and may I be proficient in every task – I ask for these eight boons.'॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)