श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d61
 
 
श्लोक  13.158.d61 
उमोवाच
भगवन् सर्वलोकेश लोकनाथ वृषध्वज।
नास्त्यात्मा कर्मभोक्तेति मृतो जन्तुर्न जायते॥
 
 
अनुवाद
उमा ने पूछा - प्रभु! सर्वलोकेश्वर! लोकनाथ! वृषभध्वज! कर्मों का फल भोगने वाली आत्मा नामक किसी भी पदार्थ का अस्तित्व नहीं है; इसीलिए मृतात्मा पुनः जन्म नहीं लेती।
 
Uman asked – Lord! Sarvlokeshwar! Loknath! Taurus flag! There is no existence of any substance called soul which enjoys the fruits of deeds; That is why a dead soul does not take birth again.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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