श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 158: प्राणियोंके चार भेदोंका निरूपण, पूर्वजन्मकी स्मृतिका रहस्य, मरकर फिर लौटनेमें कारण स्वप्नदर्शन, दैव और पुरुषार्थ तथा पुनर्जन्मका विवेचन]  »  श्लोक d42
 
 
श्लोक  13.158.d42 
श्रीमहेश्वर उवाच
सुप्तानां तु मनश्चेष्टा स्वप्न इत्यभिधीयते।
अनागतमतिक्रान्तं पश्यते संचरन्मन:॥
 
 
अनुवाद
श्री महेश्वर बोले- प्रिये! सोये हुए प्राणियों के मन की क्रियाओं को स्वप्न कहते हैं। स्वप्नों में विचरण करने वाला मन भूत और भविष्य की घटनाओं को देखता है।
 
Shri Maheshwar said-Dear! The activities of the mind of the sleeping beings are called dreams. The mind wandering in dreams sees the events of the past and the future.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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