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mahabharat 13.156.d62-d63: इस प्रकार प्रत्येक शरीर में वे अपने-अपने कर्मों का फल भोगते हैं। जो कर्म उन्होंने नहीं किए हैं, उनका फल कोई नहीं भोग सकता। देवि! मैंने यह विषय तुम्हें इस प्रकार बताया है, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो?   |   mahabharat अध्याय 13.156: अन्धत्व और पंगुत्व आदि नाना प्रकारके दोषों और रोगोंके कारणभूत दुष्कर्मोंका वर्णन]   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.156.d62-d63 
एवमात्मकृतं कर्म भुञ्जते तत्र तत्र ते।
ग्रहीतुं न च शक्यं हि केनचिद्‍ध्यकृतं फलम्॥
इति ते कथितं देवि भूय: श्रोतुं किमिच्छसि॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार प्रत्येक शरीर में वे अपने-अपने कर्मों का फल भोगते हैं। जो कर्म उन्होंने नहीं किए हैं, उनका फल कोई नहीं भोग सकता। देवि! मैंने यह विषय तुम्हें इस प्रकार बताया है, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो?
 
Thus, in each of the bodies they reap the fruits of their own deeds. No one can reap the fruits of deeds that they have not done. Devi! I have told you this topic in this manner, what else do you want to hear?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)