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mahabharat 13.154.d73: सदैव अपने अच्छे-बुरे कर्मों का साक्षी स्वयं को ही मानो और मन, वाणी या कर्म से कभी पाप करने की इच्छा मत करो।   |   mahabharat अध्याय 13.154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता  »  श्लोक d73
 
 
श्लोक  13.154.d73 
आत्मसाक्षी भवेन्नित्यमात्मनस्तु शुभाशुभे।
मनसा कर्मणा वाचा न च कांक्षेत पातकम्॥
 
 
अनुवाद
सदैव अपने अच्छे-बुरे कर्मों का साक्षी स्वयं को ही मानो और मन, वाणी या कर्म से कभी पाप करने की इच्छा मत करो।
 
Always consider yourself as the witness of your good and bad deeds and never wish to commit a sin through your mind, speech or action.
 
(दाक्षिणात्य प्रतिमें अध्याय समाप्त)


 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)