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mahabharat 13.154.d3-d5: वररोहे! देवताओं और अतिथियों की सेवा, निरन्तर धर्म, वेदों का स्वाध्याय, यज्ञ, तप, दान, पराक्रम, गुरु और आचार्य की सेवा तथा तीर्थयात्रा - ये सब अहिंसा-धर्म की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। मैंने तुम्हें धर्म का यह अत्यन्त गहन रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रों में बहुत प्रशंसा की गई है।   |   mahabharat अध्याय 13.154: अहिंसाकी और इन्द्रिय-संयमकी प्रशंसा तथा दैवकी प्रधानता   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.154.d3-d5 
देवतातिथिशुश्रूषा सततं धर्मशीलता।
वेदाध्ययनयज्ञाश्च तपो दानं दमस्तथा॥
आचार्यगुरुशुश्रूषा तीर्थाभिगमनं तथा।
अहिंसाया वरारोहे कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥
एतत् ते परमं गुह्यमाख्यातं परमार्चितम्॥
 
 
अनुवाद
वररोहे! देवताओं और अतिथियों की सेवा, निरन्तर धर्म, वेदों का स्वाध्याय, यज्ञ, तप, दान, पराक्रम, गुरु और आचार्य की सेवा तथा तीर्थयात्रा - ये सब अहिंसा-धर्म की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। मैंने तुम्हें धर्म का यह अत्यन्त गहन रहस्य बताया है, जिसकी शास्त्रों में बहुत प्रशंसा की गई है।
 
Vararohe! Service to the gods and guests, constant religiousness, study of the Vedas, yajna, penance, charity, strength, service to Guru and Acharya and traveling on pilgrimages - all these are not even equal to the sixteenth art of Ahimsa-Dharma. I have told you this, the most profound secret of religion, which has been praised extensively in the scriptures.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)