Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.15.65-66: मैंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। मुझे प्रणाम करते देख उपमन्यु ने कहा—‘पुण्डरीकाक्ष! आपका स्वागत है। आप पूजनीय होकर मेरी पूजा करते हैं और मुझे प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं, इससे हमारी तपस्या सफल हुई है।’॥65-66॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 65-66
 
 
श्लोक  13.15.65-66 
शिरसा वन्दमानं मामुपमन्युरभाषत॥ ६५॥
स्वागतं पुण्डरीकाक्ष सफलानि तपांसि न:।
य: पूज्य: पूजयसि मां द्रष्टव्यो द्रष्टुमिच्छसि॥ ६६॥
 
 
अनुवाद
मैंने सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। मुझे प्रणाम करते देख उपमन्यु ने कहा—‘पुण्डरीकाक्ष! आपका स्वागत है। आप पूजनीय होकर मेरी पूजा करते हैं और मुझे प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं, इससे हमारी तपस्या सफल हुई है।’॥65-66॥
 
I bowed my head and saluted him. Seeing me bowing, Upmanyu said—'Pundarikaksha! You are welcome. You worship me being worship-worthy and you want to see me being visible, due to this our penance has become successful.'॥ 65-66॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)