श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 345
 
 
श्लोक  13.15.345 
एवं ध्यायन्ति विद्वांस: परं तत्त्वं सनातनम्।
तद् विशेषमिति ख्यातं यदजं ज्ञानमक्षरम्॥ ३४५॥
 
 
अनुवाद
जो सनातन परमसत्ता अजन्मा, अविनाशी, ज्ञान से युक्त और उत्तम रूप से विख्यात है, उसी का ध्यान बुद्धिमान पुरुष इसी रूप में करते हैं (जैसा कि मैं आज प्रत्यक्ष देख रहा हूँ)।॥345॥
 
The eternal Supreme Reality which is unborn, indestructible, full of knowledge and renowned as the best form, is meditated upon by the wise men in this form (as I am seeing directly today).॥ 345॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)