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mahabharat 13.15.17: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिर से ऐसा कहकर पितामह भीष्म ने शंकरजी के तेज से परिपूर्ण होकर भगवान वसुदेव से ऐसा कहा॥17॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.15.17 
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा तदा भीष्मो वासुदेवं महायशा:।
भवमाहात्म्यसंयुक्तमिदमाह पितामह:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! युधिष्ठिर से ऐसा कहकर पितामह भीष्म ने शंकरजी के तेज से परिपूर्ण होकर भगवान वसुदेव से ऐसा कहा॥17॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Having said this to Yudhishthira, the great great grandfather Bhishma said this to Lord Vasudev filled with the glory of Shankarji. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)