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mahabharat 13.15.163: वे निराकार हैं। उनका स्वरूप ही सबका मूल कारण है। वे निराकार हैं। सबसे पहले जो उत्पन्न हुआ, वह जल है। इन अजन्मे महादेवजी का स्वरूप आदि-अन्त से रहित है। उन्हें कौन ठीक से जान सकता है?॥163॥   |   mahabharat अध्याय 13.15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 15: भीष्मजीकी आज्ञासे भगवान‍् श्रीकृष्णका युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथामें उपमन्युद्वारा महादेवजीकी स्तुति-प्रार्थना, उनके दर्शन और वरदान पानेका तथा अपनेको दर्शन प्राप्त होनेका कथन  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  13.15.163 
अरूपस्याद्यरूपस्य अतिरूपाद्यरूपिण:।
अनाद्यन्तमजस्यान्तं वेत्स्यते कोऽस्य तत्त्वत:॥ १६३॥
 
 
अनुवाद
वे निराकार हैं। उनका स्वरूप ही सबका मूल कारण है। वे निराकार हैं। सबसे पहले जो उत्पन्न हुआ, वह जल है। इन अजन्मे महादेवजी का स्वरूप आदि-अन्त से रहित है। उन्हें कौन ठीक से जान सकता है?॥163॥
 
He is formless. His form is the root cause of everything. He is beyond form. The first thing that was created is water. The form of this unborn Mahadevji is without beginning or end. Who can know him correctly?॥163॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)