श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.149.41 
उमोवाच
महान् मे संशय: कश्चिन्मर्त्यान् प्रति महेश्वर।
तस्मात् त्वं नैपुणेनाद्य मम व्याख्यातुमर्हसि॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
उसने पूछा - महेश्वर ! मुझे मनुष्यों के विषय में बड़ा संदेह है । कृपया उस संदेह का भली-भाँति समाधान करें ॥ 41॥
 
He asked - Maheshwar! I have a big doubt about humans. Please solve that doubt well. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)