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mahabharat 13.149.1: उमा ने पूछा - प्रभु ! सर्वभूतेश्वर देवासुर्वन्दित देव ! विभो ! अब मुझे धर्म और अधर्म का स्वरूप बताइए; जिससे मेरा उसके विषय में संशय दूर हो जाए ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 13.149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 149: बन्धन-मुक्ति, स्वर्ग, नरक एवं दीर्घायु और अल्पायु प्रदान करनेवाले शरीर, वाणी और मनद्वारा किये जानेवाले शुभाशुभ कर्मोंका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.149.1 
उमोवाच
भगवन् सर्वभूतेश देवासुरनमस्कृत।
धर्माधर्मौ नृणां देव ब्रूहि मेऽसंशयं विभो॥ १॥
 
 
अनुवाद
उमा ने पूछा - प्रभु ! सर्वभूतेश्वर देवासुर्वन्दित देव ! विभो ! अब मुझे धर्म और अधर्म का स्वरूप बताइए; जिससे मेरा उसके विषय में संशय दूर हो जाए ॥1॥
 
Uman asked – Lord! Sarvbhuteshwar Devassurvandit Dev! Vibho! Now tell me the nature of Dharma and Adharma; So that my doubts about him go away. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)