श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  13.148.59 
एतत् ते गुह्यमाख्यातं यथा शूद्रो भवेद् द्विज:।
ब्राह्मणो वा च्युतो धर्माद् यथा शूद्रत्वमाप्नुते॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
हे गिरिराजकुमारी! मैंने तुम्हें यह गूढ़ रहस्य बताया है कि किस प्रकार एक शूद्र धर्म के मार्ग पर चलकर ब्राह्मण बन जाता है और किस प्रकार एक ब्राह्मण अपने धर्म को त्यागकर तथा अपनी जाति से गिरकर शूद्र बन जाता है।
 
O princess of Giri! I have told you the deep secret of how a Shudra becomes a Brahmin by following the path of righteousness and how a Brahmin becomes a Shudra by abandoning his religion and falling from his caste.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४३॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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