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mahabharat 13.148.41: क्षत्रिय को चाहिए कि वह सबका आतिथ्य करके सदैव प्रसन्न रहे और धर्म, अर्थ और काम का उपभोग करे। यदि शूद्र भी भोजन की इच्छा करे और उसके लिए प्रार्थना करे, तो क्षत्रिय को चाहिए कि वह उसे सदैव उत्तर दे कि तुम्हारे लिए भोजन तैयार है, आओ और खा लो। ॥41॥   |   mahabharat अध्याय 13.148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.148.41 
सर्वातिथ्यं त्रिवर्गस्य कुर्वाण: सुमना: सदा।
शूद्राणां चान्नकामानां नित्यं सिद्धमिति ब्रुवन्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
क्षत्रिय को चाहिए कि वह सबका आतिथ्य करके सदैव प्रसन्न रहे और धर्म, अर्थ और काम का उपभोग करे। यदि शूद्र भी भोजन की इच्छा करे और उसके लिए प्रार्थना करे, तो क्षत्रिय को चाहिए कि वह उसे सदैव उत्तर दे कि तुम्हारे लिए भोजन तैयार है, आओ और खा लो। ॥41॥
 
A Kshatriya should always be happy to serve everyone with hospitality and enjoy Dharma, Artha and Kama. Even if a Shudra desires food and prays for it, a Kshatriya should always reply to him that food is ready for you, come and eat it. ॥ 41॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)