| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 148: ब्राह्मणादि वर्णोंकी प्राप्तिमें मनुष्यके शुभाशुभ कर्मोंकी प्रधानताका प्रतिपादन » श्लोक 30-34 |
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| | | | श्लोक 13.148.30-34  | ऋतवागनहंवादी निर्द्वन्द्व: शमकोविद:॥ ३०॥
यजते नित्ययज्ञैश्च स्वाध्यायपरम: शुचि:।
दान्तो ब्राह्मणसत्कर्ता सर्ववर्णबुभूषक:॥ ३१॥
गृहस्थव्रतमातिष्ठन् द्विकालकृतभोजन:।
शेषाशी विजिताहारो निष्कामो निरहंवद:॥ ३२॥
अग्निहोत्रमुपासंश्च जुह्वानश्च यथाविधि।
सर्वातिथ्यमुपातिष्ठन् शेषान्नकृतभोजन:॥ ३३॥
त्रेताग्निमन्त्रविहितो वैश्यो भवति वै द्विज:।
स वैश्य: क्षत्रियकुले शुचौ महति जायते॥ ३४॥ | | | | | | अनुवाद | | वैश्य को चाहिए कि वह सत्यवादी, अहंकाररहित, कलहरहित, शांति के साधनों का ज्ञाता, स्वाध्याय में तत्पर और पवित्र हो तथा नित्य यज्ञ करे। जितेन्द्रिय होकर ब्राह्मणों का आतिथ्य करके वह सब वर्णों की उन्नति चाहे। गृहस्थ व्रत का पालन करते हुए प्रतिदिन केवल दो बार भोजन करे। यज्ञ से बचा हुआ अन्न ही खाए। आहार पर संयम रखे। समस्त कामनाओं का त्याग करे। अहंकाररहित होकर विधिपूर्वक हवन करके अग्निहोत्र का अनुष्ठान करे। सबको आतिथ्य प्रदान करने के बाद बचा हुआ भोजन स्वयं खाए। मंत्रोच्चार द्वारा त्रिविध अग्नि की देखभाल करे। जो वैश्य ऐसा करता है, वह द्विज है। वह वैश्य पवित्र और श्रेष्ठ क्षत्रिय कुल में उत्पन्न होता है। 30—34॥ | | | | A Vaishya should be truthful, egoless, conflict-free, knowledgeable about the means of peace, devoted to self-study and pure, and perform daily sacrifices. By being Jitendriya, he wants the progress of all the varnas by giving hospitality to the Brahmins. While observing the fast of the householder, he should eat only two meals every day. Eat only the remaining food from the Yagya. Control your diet. Give up all desires. Be egoless and perform Agnihotra rituals by offering sacrifices in a proper manner. After providing hospitality to everyone, he should eat the leftover food himself. Take care of the threefold fire by chanting mantras. The Vaishya who does this is a Dwija. That Vaishya is born in a holy and great Kshatriya clan. 30—34॥ | | ✨ ai-generated | | |
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