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श्लोक 13.148.3  |
वैश्यो वा क्षत्रिय: केन द्विजो वा क्षत्रियो भवेत्।
प्रतिलोम: कथं देव शक्यो धर्मो निवर्तितुम्॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| अथवा क्षत्रिय किन कर्मों से वैश्य बनता है और ब्राह्मण किन कर्मों से क्षत्रिय बनता है? हे प्रभु! विपरीत धर्म का नाश कैसे हो सकता है?॥3॥ |
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| Or by what deeds does a Kshatriya become a Vaishya and by what deeds does a Brahmin become a Kshatriya? O Lord! How can the opposite religion be eliminated?॥ 3॥ |
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