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mahabharat 13.147.d1: मनुष्य को चाहिए कि पहले गृहस्थ बने, पुत्र उत्पन्न करके अपने पूर्वजों का ऋण चुकाए, पत्नी के साथ आवश्यक कार्य संपन्न करे और फिर अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए घर त्याग दे।   |   mahabharat अध्याय 13.147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.147.d1 
(भूत्वा पूर्वं गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च।
कलत्रकार्यं संतृप्य कारणात् संत्यजेद् गृहम्॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य को चाहिए कि पहले गृहस्थ बने, पुत्र उत्पन्न करके अपने पूर्वजों का ऋण चुकाए, पत्नी के साथ आवश्यक कार्य संपन्न करे और फिर अपने धार्मिक कर्तव्यों का पालन करने के लिए घर त्याग दे।
 
A man should first become a householder, repay the debt of his forefathers by producing sons, complete the work that needs to be done with his wife and then abandon his home to perform his religious duties.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)