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mahabharat 13.147.59: वह इन्द्रलोक में जाकर स्वस्थ एवं दिव्य सौन्दर्य से युक्त होकर आनन्द भोगता है और अपनी इच्छानुसार चलने वाले विमान में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहता है ॥59॥   |   mahabharat अध्याय 13.147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 147: उमा-महेश्वर-संवाद, वानप्रस्थ-धर्म तथा उसके पालनकी विधि और महिमा  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  13.147.59 
कामगेन विमानेन स वै चरति छन्दत:।
शक्रलोकगत: श्रीमान् मोदते च निरामय:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
वह इन्द्रलोक में जाकर स्वस्थ एवं दिव्य सौन्दर्य से युक्त होकर आनन्द भोगता है और अपनी इच्छानुसार चलने वाले विमान में स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहता है ॥59॥
 
He goes to Indraloka and enjoys the bliss of being healthy and full of divine beauty and keeps roaming freely in the plane that moves as per his wish. 59॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि उमामहेश्वरसंवादे द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उमामहेश्वरसंवादविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३७ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ९६ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)